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सात चिरंजीवियों में से एक हैं परशुराम

Written By ब्‍लोग चौपाल on Friday, 18 May 2012 | 06:58

Friday, 18 May 2012


परशुराम भार्गव वंशी महर्षि जमदग्नि के पांच पुत्रों में सबसे छोटे थे। इनकी माता कामली रेणुका इक्ष्वाकु वंशी राजा की पुत्री थीं। इनका नाम ‘राम’ था। शिव से प्रसिद्ध परशु प्राप्त करने के बाद ये परशुराम के नाम से प्रसिद्ध हुए। भार्गव वंश के लोग गुजरात में रहते थे और पश्चिम भारत में राज्य करने वाले हैहयों के कुलगुरु थे। बाद में भार्गवों और हैहयों में शत्रुता हो गई। परशुराम के समय में यह शत्रुता चरम-सीमा पर थी।एक बार परशुराम तपस्या करने के लिए जाते समय अपनी कामधेनु पिता जमदग्नि के आश्रम में छोड़ गए थे। अवसर पाकर हैहय राजा कार्तवीर्य ऋषि को मार कर और आश्रम को जला कर कामधेनु को ले गया। परशुराम के वापस आने पर माता रेणुका ने इक्कीस बार छाती पीट कर अपना दु:ख प्रकट किया तो परशुराम ने क्षत्रियों का नाश करने की प्रतिज्ञा कर डाली। परशुराम ने शस्त्र विद्या द्रोणाचार्य से सीखी थी।
इससे पूर्व एक बार पत्नी के चित्त की चंचलता से क्रुद्ध जमदग्नि ने जब अपने पुत्रों को रेणुका का सिर काटने के लिए कहा तो परशुराम ने मां का सिर काट डाला। बाद में पिता से मां को जीवित करने का वरदान भी लिया। इसी तरह जब गणेश ने असमय इनको शिवजी के शयनागार में जाने से रोका तो गणेश का दांत ही तोड़ दिया। राम द्वारा शिव-धनुष तोड़ने पर भी इन्होंने अत्यंत क्रोध प्रकट किया था।
महाभारत तथा पुराणों में इनके 21 बार क्षत्रियों का संहार करने का बड़ा लोमहर्षक वर्णन मिलता है। इनके नरसंहार से बचे हुए केवल 8 क्षत्रियों के नाम उल्लिखित हैं। पर विद्वानों का मत है कि यह पौराणिक वर्णन वास्तव में भार्गव और हैहयों के बीच हुआ आर्थिक और सत्ता संघर्ष था। परशुराम आदि भार्गव समुद्र के पश्चिमी किनारे पर रह कर पश्चिमी देशों से नौकाओं द्वारा व्यापार करते थे और बड़े संपन्न थे। 
पश्चिमी भारत पर राज्य करने वाले हैहयों ने इस विदेशी व्यापार पर अधिकार करना चाहा। कार्तवीर्य अजरुन ने इस उद्देश्य से सहस्र नौकाएं बना लीं।  इसी से उसका सहस्नजरुन नाम पड़ा। यह व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता ही भार्गवों और हैहयों के युद्ध का कारण बनी। इसमें परशुराम के नेतृत्व में हैहयों की 21 बार पराजय हुई। पुराणकारों ने इसका वर्णन क्षत्रिय संहार के रूप में किया है।
युद्ध के बाद परशुराम ने हैहय क्षेत्र में नया राज्य स्थापित किया। अंत में सब कुछ ब्राह्मणों को दान देकर वे स्वयं तपस्या करने चले गए। ये विष्णु भगवान के प्रमुख दस अवतारों में कालक्रम से छठे अवतार हैं। इनका अविर्भाव वैशाख शुक्ल तृतीया को प्रदोष काल में हुआ था। राम विवाह के समय अपने गुरु शिवजी के धनुष का भंग सुन कर वे जनकपुरी में आये और श्रीराम का शक्ति परिचय पाकर उन्हें अपना भी धनुष देकर पुन: चले गए।
असम राज्य की उत्तरी-पूर्वी सीमा में जहां ब्रह्मपुत्र नदी भारत में प्रवेश करती है, वहीं परशुराम कुण्ड है, जहां तप करके उन्होंने शिवजी से परशु प्राप्त किया था। वहीं पर उसे विसजिर्त भी किया। परशुराम जी भी सात चिरंजीवियों में से एक हैं। इनका पाठ करने से दीर्घायु प्राप्त होती है।
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संपत्ति

Written By ब्‍लोग चौपाल on Thursday, 17 May 2012 | 18:17

Thursday, 17 May 2012


एक बार भीष्म पितामह हस्तिनापुर में मुनि शम्पाक का सत्संग कर रहे थे। भीष्म ने प्रश्न किया, ‘मुनिवर, हम धनी और निर्धन, दोनों को किसी न किसी रूप में असंतुष्ट व दुखी देखते हैं। आपकी दृष्टि में जिसके पास अथाह धन है, जिस पर लक्ष्मी की कृपा है, वह दुखी और असंतुष्ट किस कारण रहता है।’
 मुनि शम्पाक बताते हैं, ‘आवश्यकता से अधिक धन जिसे प्राप्त हो जाता है, उसमें अहंकार आना स्वाभाविक है। अत्यधिक संपत्ति अपने साथ अनेक दुर्गुण लेकर आती है। वह सबसे पहले मति हरती है। बिना परिश्रम के जिसे असीमित धन मिल जाता है, वह कुरूप होते हुए भी खुद को रूपवान समझने लगता है, मूर्ख होते हुए भी खुद को बुद्धिमान समझने लगता है। सात्विकता और सरलता का त्याग कर वह भोग-विलास में डूब जाता है। उसकी इच्छाएं दिनोंदिन बढ़ने लगती हैं। यही उसके पतन का कारण बनता है।’ मुनि ने आगे बताया, ‘लक्ष्मी उस मूर्ख को मोह में डालती रहती है। वायु जैसे शरद ऋतु के बादलों को उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार लक्ष्मी उसके चित्त को हर लेती है। धन का अंधाधुंध उपभोग करते रहने के कारण अंत में एक दिन वह धनहीन हो जाता है। दरिद्र हो जाने पर उसे और अधिक कष्ट भोगने पड़ते हैं।’
 कुछ क्षण रुककर मुनि ने फिर कहा, ‘यदि धनी स्वतः धन का सत्कर्मों में उपयोग करे, संयमी व सात्विक बना रहे, धन को अपना न मानकर भगवान का दिया प्रसाद मान ले, धन का किंचित अहंकार न करे, तो धनविहीन हो जाने पर भी उसे दुख नहीं होता।
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भूलों को स्‍वीकारना


अपनी भूलों को स्‍वीकारना उस झाड़ू के समान है जो गंदगी को साफ कर उस स्‍थान को पहले से अधिक स्‍वच्‍छ कर देती है। ----- महात्‍मा गांधी 
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हिमाचल की शान लोकगायिका कमला भारद्धाज




रिपोर्ट :- दीपक शर्मा 'कुल्लुवी'

प्राकृतिक दृष्यों से भरपूर कुल्लू जिले के एक सुन्दर से गाँव सैंज की रहने वाली पहाड़ी लोकगीतों की मलिका श्रीमति कमला भारद्धाज किसी भी परिचय की मोहताज़ नहीं है I लम्बी कदकाठी दिलकश आवाज़ और सुन्दरता इनकी पहचान है I इनके पतिदेव श्री गिरधारी लाल जी रिटायर्ड टीचर होने के साथ साथ कुल्लू नाटी के एक लोकप्रिय नर्तक रह चुके हैं और इस उम्र में भी नृत्य करने से पीछे नहीं हटते I
कमला भारद्धाज जी नें समूचे देश में हजारों प्रोग्राम दिए हैं शायद ही देश का कोई ऐसा रडियो स्टेशन छूटा हो जहाँ से इनके सुरीले पहाड़ी लोकगीत न गूंजे हों I कई टी० वी० स्टेशन पर भी इनके प्रोग्राम प्रसारित कर चुके हैं I अब तक कमला भारद्धाज जी अब तक हजारों ईनाम हासिल कर चुकी हैं I इनका घर अवार्डों से भरा हुआ है I इनका तीन तीन पुत्रों,पुत्रबधुओं,पोते,पोतियों से भरा पूरा परिवार है I
हाल ही में में अपने पिता श्री जयदेव 'विद्रोही' व् अपनी धर्मपत्नी 'कुमुद' के साथ कमला भारद्धाज जी का इंटरव्यू लेने इनके गाँव गए थे जहाँ हमारा भरपूर स्वागत हुआ ऊँची पहाड़ी पर स्थित इनका घर खेत खलिहानों सेब के बगीचों से घिरा हुआ है I ठंडी ठंडी हवाएं बातावरण को लुभा रही थी लगभग दो घंटे हम वहां रुके और खूबसूरती का आनंद उठाया I
आज भी उनकी आवाज़ में वोह दम है कि अच्छे अच्छे गायक उनके उनकी दिलकश आवाज़ के क़ायल बन जाएँ I
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कौन बनेगा इस दशक का हिन्दी चिट्ठाकार ?



जैसा कि आप सभी को विदित है कि इस वर्ष के समापन के साथ ही हिन्दी ब्लॉग जगत नए दशक मे प्रवेश कर जाएगा, इसलिए परिकल्पना समूह के द्वारा यह निर्णय लिया गया है कि परिकल्पना सम्मान के साथ दशक के श्रेष्ठ पाँच ब्लॉग और दशक के श्रेष्ठ पाँच ब्लॉगर का भी सारस्वत सम्मान किया जाये। 

इसके लिए परिकल्पना पर दिनांक 12.05.2012 को आप सभी से वोट देने हेतु आग्रह किया गया था, वोटिंग लाइन शुरू होने के चौबीस घंटे के भीतर जो रुझान(परिणाम नहीं)आए हैं उसके आधार पर जो स्थिति बनी है वह इसप्रकार है :
दशक के हिन्दी चिट्ठाकार:
(1) समीर लाल समीर    (41 वोट)
(2) रंजना (रंजू भाटिया)  (21 वोट)
(3) रवि रतलामी        (14 वोट)
(4) पूर्णिमा वर्मन        (09 वोट)
(5) कविता वाचक्नवी     (07 वोट)
(6) अनूप शुक्ल         (05 वोट)
(7) आशीष श्रीवास्तव     (03 वोट)
(8) सतीश सक्सेना       (02 वोट)

दृष्टव्य : जितेंद्र चौधरी और सुनील दीपक को कोई वोट नहीं मिला है अभीतक । साथ ही अन्य विकल्प के अंतर्गत प्राप्त मतों के आधार पर रवीन्द्र प्रभात (05 वोट), रश्मि प्रभा(03 वोट), अविनाश वाचस्पति (01वोट),हंसराज सुज्ञ(01 वोट),राजेन्द्र स्वर्णकार(01 वोट),उमेश चतुर्वेदी (01 वोट),संगीता पूरी (01 वोट),डा। श्याम गुप्त  (01 वोट), दिव्या श्रीवास्तव (01 वोट).......... आदि को भी वोट प्राप्त हुये हैं । रवीन्द्र प्रभात को छोडकर शेष सभी वोट आखिरी परिणाम मे शामिल किए जाएँगे ।
दशक का हिन्दी चिट्ठा :
(1) उड़न तश्तरी           (39 वोट)
(2) फुरसतिया             (19 वोट)
(3)  ब्लोगस इन मीडिया    (11 वोट)
(4) भड़ास                (09 वोट)
(5) नारी                 (08 वोट)
(6) छींटे और बौछारें       (05 वोट)
(7) साई ब्लॉग            (03 वोट)
(8) साइंस ब्लॉगर असोसियेशन (02 वोट)
(9) मेरा पन्ना             (01 वोट)
(10)  जो न कह सके       (01 वोट)

दृष्टव्य: अन्य विकल्प के अंतर्गत प्राप्त मतों के आधार पर परिकल्पना  (09 वोट), मेरे भावनाएं (03 वोट)उपचार (01 वोट),निरामिष (01 वोट), शब्द सारंग (01वोट)........आदि को भी वोट प्राप्त हुये हैं । परिकल्पना को छोडकर शेष सभी वोट आखिरी परिणाम मे शामिल किए जाएँगे ।

तो देर न करें वोटिंग लाइन अभी चालू है, इस लिंक पर जाकर अपने प्रिय ब्लॉगर को अवश्य वोट दें । याद रखें आपका वोट हमारे लिए महत्वपूर्ण है

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क्या हिन्दी ब्लॉगजगत सचमुच बच्चा है जी ?



 
पिछले पोस्ट में कुछ ऐसी टिप्पणियाँ पढ़ने को मिली,जिसमें एक चर्चित महिला ब्लॉगर के द्वारा कहा गया कि “दशक पूरा होने में अभी 3 साल होंगे कम-से कम ।“ उनकी यह गणना ब्लॉग पर उनके स्वयं के अवतरण वर्ष से है या फिर कुछ और, मैं नहीं जानता । एक ब्लॉगर ने तो वोट के लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर ही आपत्ति दर्ज कर दी, जबकि पूरी दुनिया चुनाव की लोकतान्त्रिक व्यवस्था को श्रेष्ठ व्यवस्था की संज्ञा देती है । किसी ने कहा कि लिस्ट छोटी कर दी आपने । उनके लिए मेरी कैफियत यह है कि मैंने अदर का विकल्प इसलिए दिया है ताकि आप यदि इन ब्लॉगरों के नाम से असहमत हैं तो  अपनी पसंद के ब्लोगर का नाम अंकित कर दें । जो चुनाव की लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर अपनी असहमति व्यक्त कर रहे हैं, वे शायद भूल रहे हैं कि ब्लॉग भी अभिव्यक्ति की लोकतान्त्रिक व्यवस्था का ही एक हिस्सा है । 

खैर छोड़िए, आइये विगत 48 घंटों में प्राप्त रुझान पर नज़र डालते हैं : 
 क्र. सं. 
दशक का हिन्दी चिट्ठाकार
 क्र. सं. 
दशक का हिन्दी चिट्ठा
1
समीर लाल समीर 
1
उड़न तश्तरी    
2
रवि रतलामी 
2
ब्लॉगस  इन  मीडिया  
3
 रंजना रंजू भाटिया  
3
फ़ुरसतिया 
4
अनूप शुक्ल 
4
भड़ास    
5
पूर्णिमा वर्मन 
5
साइंस  ब्लोगर असोसिएशन     
6
 दिनेश राय द्विवेदी  
6
अज़दक 
7
बी एस पावला
7
छींटें  और बौछारें     
8
सतीश सक्सेना
8
तीसरा  खंबा    
 9
कविता  वाचक्नवी 
 9
साई  ब्लॉग  
10
शास्त्री जे सी फिलिप
10
नारी 
दृष्टव्य : अड़तालीस घंटे की प्राप्त रुझान मे जहां विगत चौबीस घंटे की तुलना में समीर लाल समीर और उनका ब्लॉग उड़न तश्तरी प्रथम स्थान पर विराजमान है, वहीं मतदाताओं ने लिस्ट में शामिल कई नामों क्रमश: जितेंद्र चौधरी, आशीष श्रीवास्तव और सुनील दीपक को शीर्ष दस के वरीयता क्रम से बाहर करते हुये नए नाम क्रमश: दिनेश राय द्विवेदी, बी॰एस॰पावला और शास्त्री जे सी फिलिप  पर अपनी सहमति व्यक्त की है। इसी प्रकार मतदाताओं ने लिस्ट में शामिल कई चिट्ठों क्रमश: मेरा पन्ना,जो न कह सके ब्लॉग को शीर्ष दस के वरीयता क्रम से बाहर करते हुये नए नाम क्रमश: अजदक और तीसरा खंबा पर अपनी सहमति व्यक्त की है। 

अब देखना है कि अगले चौबीस घंटे मे उलटफेर की क्या स्थिति बनती है ?


तो देर न करें वोटिंग लाइन अभी चालू है, इस लिंक पर जाकर अपने प्रिय ब्लॉगर को अवश्य वोट दें । याद रखें आपका वोट हमारे लिए महत्वपूर्ण है।


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गोपनीयता

अगर हम स्‍वयं ही अपना राज गुप्‍त नहीं रख सकते तो किसी और से इसे गुप्‍त रखने की अपेक्षा कैसे कर सकते है। --- फ्रास्‍वां डे ला रोशेफोकाल्‍ड
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जिन्दगी है शहद की मानिंद ...

पिछले दिनों , किसी बगीचे में इक बहुत बड़े वृक्ष को देखा मैंने | उस विशाल वृक्ष पर इक सुन्दर लता यानी बेल लिपटी हुई थी | बहुत देर तक उन्हें देखती रही और ये तय नहीं कर पायी की कौन ज्यादा सुन्दर है | और कौन किसकी सुन्दरता बढ़ा रहा है | वृक्ष ने उस कोमल लता को अपना सानिध्य दिया है | या बेल ने खुद को समर्पित कर दिया वृक्ष पर | मैंने खुद ही मान लिया की कोई इक नहीं , दोनों ही सुन्दर हैं | लेकिन इक दूजे की वजह से |
कुछ दिनों बाद , देखा की वृक्ष पर कोई बेल नहीं थी | बेल टूटी हुई सी सड़क किनारे पड़ी थी | और वृक्ष भी सूना- सूना सा डरावना सा लग रहा था | बगीचे के माली से पूछने पर उसने बताया की बेल को कीड़े वाला कोई पौधों का रोग हो गया था | कहीं वृक्ष भी इससे प्रभावित ना हो जाए | इसलिए बेल को ही तोड़ कर फेंक दिया गया था |
मैं बहुत देर सोचती रही | माली को , रोग का इलाज करना था | उसे ठीक करना था | उसने तो वृक्ष को बेल से अलग ही कर दिया | क्यों किया उसने ऐसा ?
दोस्तों , असल जिन्दगी में भी तो हम आजकल यही कर रहे है ना | आये दिन टूटते विवाह | बढ़ते तलाक | ह्त्या , आत्महत्या | और किसी को चोट पहुंचाने या उसे जिन्दगी से अलग कर देने या खुद को दुख देकर हम हर समस्याओं के हल ढूंढ़ रहे है |
लेकिन , हल तो फिर भी नहीं मिलते हमें | अगर , किसी को जिन्दगी से अलग कर देने से या खुद को किसी की जिन्दगी से दूर करने से ही समाधान हो जाते तो आज दुनिया में कितनी शान्ति होती |
क्या हमने कभी सोचा| की हमारे साथी , मित्र , भाई , बहन या कोई भी आसपास रहने वाले व्यक्ति का व्यवहार हमारे प्रति , समाज के प्रति अचानक से क्यों बदल गया ?जो कल तक जान से ज्यादा प्रेम कर रहा था | वो आज जान का दुश्मन कैसे हो गया ? चलिए सीधी बात करती हूँ |
पिछले दिनों , विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस था | और इस संगठन के अनुसार सारी दुनिया में मानसिक रोगियों की संख्या इकदम से बढ़ गयी है | और इन्हीं मानसिक रोगों की वजह से रिश्तों में दरारे आ रही हैं |
आधुनिकता की दौड़ | इकदूजे को नीचा दिखाने की होड़ | पैसा | झूठी शान | दिखावे की जिन्दगी ने | और समय की कमी ने लोगों को बहुत सी मानसिक बीमारियाँ दी है | जैसे -फोबिया , मूड डिस-आर्डर , काग्नेटिवडिस -आर्डर , साइजो-प्रेनिया , अल्कोहल पर निर्भरता और डिप्रेशन |ये तो सिर्फ चंद नाम है | फेहरिस्त बहुत लम्बी है |
इन रोगों की वजह से आये दिन समाज में , रिश्ते उलझ रहे है | टूट रहे हैं | कारण समझ नहीं आते लेकिन ये हो रहा है |
दरअसल , देह के रोग दिखते हैं | उसके लक्षण भी नजर आते हैं | लेकिन मन के रोग नहीं दिखते | कोई ये कैसे बताये की वो कितने किलोग्राम दुखी है | की उसके मन पर दर्द की कितनी दरारें हैं | उसके दिमाग में कितनी अशांति है | उसे नापने के लिए कोई पैमाना नहीं किसी डॉक्टर के पास |
मन के विकारों को तो रोगी अपने विचारों , भावनाओं तथा व्यवहार से ही प्रकट करेगा ना ?
ये बात तो सिर्फ और सिर्फ वही व्यक्ति जान सकता है | जो बहुत करीब हो | जो उसे समझे | लेकिन किसी के मन को समझना क्या आसान है ? मन का कोई रूप नहीं | आकर नहीं | सीमाएं नहीं | और इससे बड़ी बात ये की किसी के पास अब धैर्य नहीं | समझ भी नहीं | कोई किसी को समझाना नहीं चाहता और ना ही समझना चाहता है |
किसी के मन की विचित्र स्थिति को भांप लेना | और विवेक से समाधान निकालना कोई नहीं चाहता | उलटे इसे पूर्वजन्मों के पाप | टोने टोटके | भूत- प्रेत और ग्रहों का फेर कहा जाता है | और पंडित , तांत्रिक , ओझा खूब इसका फायदा उठा रहे हैं | रत्न , ताबीज , यंत्र और फेंगशुई का कारोबार खूब चल निकला है | हाँ कुछ लोग चिकित्सा का सहारा भी लेते है | पर सिर्फ दवा से मन के घाव कैसे भरेगे ?
जरुरत है साथी के व्यवहार में आये असुन्तुलन के पीछे छिपे दर्द को देखने की | ना की दोषारोपण करने की | मन के रोगी को प्रेम की जरुरत होती है | हमारे स्नेह की | आत्मीयता की | हमदर्दी की | सहानुभूति की | और जब ये नहीं मिलता तो मन की हालत बिगड़ती जाती है |
इसी के चलते , हर व्यक्ति मन की सूखे टुकड़े को हरा करने के प्रयास करने लगता है | कोई तो मुझे समझे | कोई तो मन के तल तक पहुंचे | ये विचार ही नए नए रिश्ते बनने -बनाने का सबब बनता है |
हम घर का सामान , कपडे , जूते, कार , गहने खरीदते समय उन चीजों को सौ बार उलट पलट कर देखते हैं | लेकिन जो साथी आपके साथ इक पूरी जिन्दगी बिता रहा है | उसके चेहरे को गौर से देखते तक नहीं |
जिन्दगी की भागदौड में कौन कितने पीछे छूट गया ज़रा देखीये तो सही | कौनसा सिरा उलझ गया और कौन कहा भटक गया देखे तो ज़रा | आखरी बार कब हँसे थे जी खोल कर सोचे ज़रा | किसी के होठों पर कब मुस्काने आई हमारी वजह से | याद है ?
वृक्ष पर लिपटी लता वृक्ष के कारण सुन्दर नहींवो इसलिए सुन्दर है की वृक्ष उसे रोकता नहीं फैलने से | लिपटने से | जैसे साहिल से सट कर जो दरिया बहता है उसे बहने दिया जाए हम क्यों रुख मोड़ते है | बहते दरिया का | मन की गांठे , प्रेम के स्पर्श से ही खुलती है | दो बोल प्यार के जादू भरा असर करते है | और दो कड़वे बोल किसी का दिल छलनी कर देते है | लेकिन किसी भी डाक्टर के पास ऐसी कोई मशीन नहीं जिसमे ये छेद या सुराख़ दिखे |
तो क्यों ना हम , किताबों की जगह किसी का मन पढ़े | सामानों की जगह दिलों की देखभाल करे | दीवाली पर हजारों दिए रोशन करने से बेहतर है | अपने मन में प्रेम की लों जलाये | और अन्तिम बात जगजीत की गजल के साथ की " शहद जीने का मिला करता है थोड़ा -थोड़ा | " इस शहद को संभाल के रखे हम | है ना ? जिन्दगी है शहद की मानिंद ... ममता व्यास, भोपाल
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