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This is testing

Written By ब्‍लोग चौपाल on Thursday, 17 May 2012 | 09:58

Thursday, 17 May 2012

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कौन बनेगा इस दशक का हिन्दी चिट्ठाकार ?



जैसा कि आप सभी को विदित है कि इस वर्ष के समापन के साथ ही हिन्दी ब्लॉग जगत नए दशक मे प्रवेश कर जाएगा, इसलिए परिकल्पना समूह के द्वारा यह निर्णय लिया गया है कि परिकल्पना सम्मान के साथ दशक के श्रेष्ठ पाँच ब्लॉग और दशक के श्रेष्ठ पाँच ब्लॉगर का भी सारस्वत सम्मान किया जाये। 

इसके लिए परिकल्पना पर दिनांक 12.05.2012 को आप सभी से वोट देने हेतु आग्रह किया गया था, वोटिंग लाइन शुरू होने के चौबीस घंटे के भीतर जो रुझान(परिणाम नहीं)आए हैं उसके आधार पर जो स्थिति बनी है वह इसप्रकार है :
दशक के हिन्दी चिट्ठाकार:
(1) समीर लाल समीर    (41 वोट)
(2) रंजना (रंजू भाटिया)  (21 वोट)
(3) रवि रतलामी        (14 वोट)
(4) पूर्णिमा वर्मन        (09 वोट)
(5) कविता वाचक्नवी     (07 वोट)
(6) अनूप शुक्ल         (05 वोट)
(7) आशीष श्रीवास्तव     (03 वोट)
(8) सतीश सक्सेना       (02 वोट)

दृष्टव्य : जितेंद्र चौधरी और सुनील दीपक को कोई वोट नहीं मिला है अभीतक । साथ ही अन्य विकल्प के अंतर्गत प्राप्त मतों के आधार पर रवीन्द्र प्रभात (05 वोट), रश्मि प्रभा(03 वोट), अविनाश वाचस्पति (01वोट),हंसराज सुज्ञ(01 वोट),राजेन्द्र स्वर्णकार(01 वोट),उमेश चतुर्वेदी (01 वोट),संगीता पूरी (01 वोट),डा। श्याम गुप्त  (01 वोट), दिव्या श्रीवास्तव (01 वोट).......... आदि को भी वोट प्राप्त हुये हैं । रवीन्द्र प्रभात को छोडकर शेष सभी वोट आखिरी परिणाम मे शामिल किए जाएँगे ।
दशक का हिन्दी चिट्ठा :
(1) उड़न तश्तरी           (39 वोट)
(2) फुरसतिया             (19 वोट)
(3)  ब्लोगस इन मीडिया    (11 वोट)
(4) भड़ास                (09 वोट)
(5) नारी                 (08 वोट)
(6) छींटे और बौछारें       (05 वोट)
(7) साई ब्लॉग            (03 वोट)
(8) साइंस ब्लॉगर असोसियेशन (02 वोट)
(9) मेरा पन्ना             (01 वोट)
(10)  जो न कह सके       (01 वोट)

दृष्टव्य: अन्य विकल्प के अंतर्गत प्राप्त मतों के आधार पर परिकल्पना  (09 वोट), मेरे भावनाएं (03 वोट), उपचार (01 वोट),निरामिष (01 वोट), शब्द सारंग (01वोट)........आदि को भी वोट प्राप्त हुये हैं । परिकल्पना को छोडकर शेष सभी वोट आखिरी परिणाम मे शामिल किए जाएँगे ।

तो देर न करें वोटिंग लाइन अभी चालू है, इस लिंक पर जाकर अपने प्रिय ब्लॉगर को अवश्य वोट दें । याद रखें आपका वोट हमारे लिए महत्वपूर्ण है।

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जिन्दगी है शहद की मानिंद ...

पिछले दिनों , किसी बगीचे में इक बहुत बड़े वृक्ष को देखा मैंने | उस विशाल वृक्ष पर इक सुन्दर लता यानी बेल लिपटी हुई थी | बहुत देर तक उन्हें देखती रही और ये तय नहीं कर पायी की कौन ज्यादा सुन्दर है | और कौन किसकी सुन्दरता बढ़ा रहा है | वृक्ष ने उस कोमल लता को अपना सानिध्य दिया है | या बेल ने खुद को समर्पित कर दिया वृक्ष पर | मैंने खुद ही मान लिया की कोई इक नहीं , दोनों ही सुन्दर हैं | लेकिन इक दूजे की वजह से |
कुछ दिनों बाद , देखा की वृक्ष पर कोई बेल नहीं थी | बेल टूटी हुई सी सड़क किनारे पड़ी थी | और वृक्ष भी सूना- सूना सा डरावना सा लग रहा था | बगीचे के माली से पूछने पर उसने बताया की बेल को कीड़े वाला कोई पौधों का रोग हो गया था | कहीं वृक्ष भी इससे प्रभावित ना हो जाए | इसलिए बेल को ही तोड़ कर फेंक दिया गया था |
मैं बहुत देर सोचती रही | माली को , रोग का इलाज करना था | उसे ठीक करना था | उसने तो वृक्ष को बेल से अलग ही कर दिया | क्यों किया उसने ऐसा ?
दोस्तों , असल जिन्दगी में भी तो हम आजकल यही कर रहे है ना | आये दिन टूटते विवाह | बढ़ते तलाक | ह्त्या , आत्महत्या | और किसी को चोट पहुंचाने या उसे जिन्दगी से अलग कर देने या खुद को दुख देकर हम हर समस्याओं के हल ढूंढ़ रहे है |
लेकिन , हल तो फिर भी नहीं मिलते हमें | अगर , किसी को जिन्दगी से अलग कर देने से या खुद को किसी की जिन्दगी से दूर करने से ही समाधान हो जाते तो आज दुनिया में कितनी शान्ति होती |
क्या हमने कभी सोचा| की हमारे साथी , मित्र , भाई , बहन या कोई भी आसपास रहने वाले व्यक्ति का व्यवहार हमारे प्रति , समाज के प्रति अचानक से क्यों बदल गया ?जो कल तक जान से ज्यादा प्रेम कर रहा था | वो आज जान का दुश्मन कैसे हो गया ? चलिए सीधी बात करती हूँ |
पिछले दिनों , विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस था | और इस संगठन के अनुसार सारी दुनिया में मानसिक रोगियों की संख्या इकदम से बढ़ गयी है | और इन्हीं मानसिक रोगों की वजह से रिश्तों में दरारे आ रही हैं |
आधुनिकता की दौड़ | इकदूजे को नीचा दिखाने की होड़ | पैसा | झूठी शान | दिखावे की जिन्दगी ने | और समय की कमी ने लोगों को बहुत सी मानसिक बीमारियाँ दी है | जैसे -फोबिया , मूड डिस-आर्डर , काग्नेटिवडिस -आर्डर , साइजो-प्रेनिया , अल्कोहल पर निर्भरता और डिप्रेशन |ये तो सिर्फ चंद नाम है | फेहरिस्त बहुत लम्बी है |
इन रोगों की वजह से आये दिन समाज में , रिश्ते उलझ रहे है | टूट रहे हैं | कारण समझ नहीं आते लेकिन ये हो रहा है |
दरअसल , देह के रोग दिखते हैं | उसके लक्षण भी नजर आते हैं | लेकिन मन के रोग नहीं दिखते | कोई ये कैसे बताये की वो कितने किलोग्राम दुखी है | की उसके मन पर दर्द की कितनी दरारें हैं | उसके दिमाग में कितनी अशांति है | उसे नापने के लिए कोई पैमाना नहीं किसी डॉक्टर के पास |
मन के विकारों को तो रोगी अपने विचारों , भावनाओं तथा व्यवहार से ही प्रकट करेगा ना ?
ये बात तो सिर्फ और सिर्फ वही व्यक्ति जान सकता है | जो बहुत करीब हो | जो उसे समझे | लेकिन किसी के मन को समझना क्या आसान है ? मन का कोई रूप नहीं | आकर नहीं | सीमाएं नहीं | और इससे बड़ी बात ये की किसी के पास अब धैर्य नहीं | समझ भी नहीं | कोई किसी को समझाना नहीं चाहता और ना ही समझना चाहता है |
किसी के मन की विचित्र स्थिति को भांप लेना | और विवेक से समाधान निकालना कोई नहीं चाहता | उलटे इसे पूर्वजन्मों के पाप | टोने टोटके | भूत- प्रेत और ग्रहों का फेर कहा जाता है | और पंडित , तांत्रिक , ओझा खूब इसका फायदा उठा रहे हैं | रत्न , ताबीज , यंत्र और फेंगशुई का कारोबार खूब चल निकला है | हाँ कुछ लोग चिकित्सा का सहारा भी लेते है | पर सिर्फ दवा से मन के घाव कैसे भरेगे ?
जरुरत है साथी के व्यवहार में आये असुन्तुलन के पीछे छिपे दर्द को देखने की | ना की दोषारोपण करने की | मन के रोगी को प्रेम की जरुरत होती है | हमारे स्नेह की | आत्मीयता की | हमदर्दी की | सहानुभूति की | और जब ये नहीं मिलता तो मन की हालत बिगड़ती जाती है |
इसी के चलते , हर व्यक्ति मन की सूखे टुकड़े को हरा करने के प्रयास करने लगता है | कोई तो मुझे समझे | कोई तो मन के तल तक पहुंचे | ये विचार ही नए नए रिश्ते बनने -बनाने का सबब बनता है |
हम घर का सामान , कपडे , जूते, कार , गहने खरीदते समय उन चीजों को सौ बार उलट पलट कर देखते हैं | लेकिन जो साथी आपके साथ इक पूरी जिन्दगी बिता रहा है | उसके चेहरे को गौर से देखते तक नहीं |
जिन्दगी की भागदौड में कौन कितने पीछे छूट गया ज़रा देखीये तो सही | कौनसा सिरा उलझ गया और कौन कहा भटक गया देखे तो ज़रा | आखरी बार कब हँसे थे जी खोल कर सोचे ज़रा | किसी के होठों पर कब मुस्काने आई हमारी वजह से | याद है ?
वृक्ष पर लिपटी लता वृक्ष के कारण सुन्दर नहींवो इसलिए सुन्दर है की वृक्ष उसे रोकता नहीं फैलने से | लिपटने से | जैसे साहिल से सट कर जो दरिया बहता है उसे बहने दिया जाए हम क्यों रुख मोड़ते है | बहते दरिया का | मन की गांठे , प्रेम के स्पर्श से ही खुलती है | दो बोल प्यार के जादू भरा असर करते है | और दो कड़वे बोल किसी का दिल छलनी कर देते है | लेकिन किसी भी डाक्टर के पास ऐसी कोई मशीन नहीं जिसमे ये छेद या सुराख़ दिखे |
तो क्यों ना हम , किताबों की जगह किसी का मन पढ़े | सामानों की जगह दिलों की देखभाल करे | दीवाली पर हजारों दिए रोशन करने से बेहतर है | अपने मन में प्रेम की लों जलाये | और अन्तिम बात जगजीत की गजल के साथ की " शहद जीने का मिला करता है थोड़ा -थोड़ा | " इस शहद को संभाल के रखे हम | है ना ? जिन्दगी है शहद की मानिंद ... ममता व्यास, भोपाल
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हम विचार और व्‍यवहार से पहचाने जाते है। विचार हमारे मन मस्तिष्‍क का हिस्‍सा है जो दिखाई नहीं देता पर जनित व्‍यवहार दिखाई देता है और अनुभव भी किया जाता है।


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Written By ब्‍लोग चौपाल on Wednesday, 16 May 2012 | 08:14

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