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सृजन का सुख अकथनीय होता है

Written By ब्‍लोग चौपाल on Wednesday, 2 May 2012 | 08:12


रवीन्द्र प्रभातसृजन का सुख अकथनीय होता है . इस सुख को शब्दों की सीमा में बंधकर जाना नही जा सकता. और जो सृजन सूक्ति की शक्ल अख्तियार कर ले तो क्या कहने . सृजन की ताकत असीम होती है और अर्थवान भी. यह संवाद कायम करती है,आपस में जोड़ती है, बिगड़ जाए तो दूरी पैदा करती है , भावनात्मक एकता का अद्भुत संगम बना सकती है . वसुधैव कुटुंबकम का सपना साकार करा सकती है. इसे साध लिया तो हर मंजिल आसान हो जाती है .
एक अवसर मिला है हर किसी को इस उत्सव के माध्यम से सृजन को  साधने की . सृजन की ताकत को पहचानने की और वक़्त के साथ अपने कदमों को दृढ़ता के साथ प्रगति की दिशा में ले चलने की . ब्लॉगोत्सव एक शुरुआत है , इसे मजबूत आधार आपको प्रदान करना है अपने सृजन की ताकत से …!
विविधता में एकता को प्रतिष्ठापित करने के उद्देश्य से इस उत्सव की परिकल्पना की गयी थी. आशाओं के अनुरूप हिंदी चिट्ठाकारों ने इसका समर्थन ही नहीं किया, अपितु इसकी सफलता की कामना भी की. परिणाम आपके सामने है . प्रत्येक ने एकरूपता की नहीं , अपितु एकता की कामना की है . यही कारण है कि इस दिशा में हमारी प्रतिबद्धता एक नए मुकाम की ओर अग्रसर है …!
यदि आप अभी तक इस कारबां में शामिल नही हुए हैं तो शर्माईये मत आईए इस कारबां में शामिल होकर दीजिये अपने सृजन को एक नई धार….परिकल्पना ब्लॉगोत्सव के साथ !

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